आकेश मिट्टी के फ्लोर पर बैठा हुआ था। उसने अखबार का एक टुकड़ा उठाया और धीरे से नाव बनाई। वह नाव दरवाज़े के पास एक तालाब में तैर गई। सूरज पहाड़ों के पीछे ढल रहा था, सब कुछ सुनहरा हो गया।
आकेश खड़ा हुआ और पहली तारे को देखने लगा। लाल मिट्टी के ऊपर वह चमकती हुई रस्सी की तरह लग रही थी। उसने उंगली से उसकी राह बनाई। 'वह कहाँ जाती है?' वह फुसफुसाया। उसकी आँखें चौंधिया गईं।
आकेश ने दीवार के पास लकड़ी के तक़ते जमा किए और चढ़ गया। छत के ऊपर से दुनिया छोटी लगने लगी — छतें, बरगद के पेड़, और पहाड़ों की मुड़ी हुई रेखाएँ। वह हँसा और नरम मिट्टी में कूद गया।
आकेश ने सूखी टहनियाँ इकट्ठी कीं और आसमान की तरफ़ एक ढाँचा बनाया। उसने ऊपर एक भूसे का घड़ा रख दिया — सितारों के खज़ाने के लिए। ढाँचा टेढ़ा हुआ और घड़ा ढीले भूसे में गिर गया।
आकेश ने एक प्राचीन संदूक खोला और एक फीका चेककर्ड कपड़ा निकाला। उसने उसे पकड़ा और हवा ने उसे बाँहों की तरह उठा लिया। कपड़ा नीम के पेड़ में जा फँस गया और *वाप-वाप* की आवाज़ करने लगा।
आकेश ने चमकीले लाल कग़ज़ से एक किरग बनाई और खेत की ओर दौड़ा। हवा ने उसे ऊपर उठा दिया — सरसों के तने से, छत से, और एक हैरान गौरैया से ऊपर। गौरैया हैरानी से चीख़ी।
काग़ज़ की किरग बरगद के पेड़ की शाखाओं में जा फँस गई, हवा में काँपती हुई। आकेश उसके नीचे खड़ा हुआ, साँस रोके हुए, आख़िरी सुनहरी रोशनी को पत्तों के बीच से फिसलते हुए देखता रहा। उसने अपनी हथेलियाँ ठंडी मिट्टी पर रख दीं और हँस पड़ा — पत्थरों पर पानी की तरह।
आकेश दरवाज़े के पास अपनी माँ की गोद में आ बैठा। उसने एक बार, दो बार उसकी पीठ थपथपाई और धीमे से बोली, 'तुम्हारे सपने ही तुम्हारी कहानी लिखेंगे, आकेश।' उसने अपना सिर कंधे पर टिका दिया और किरग के सितारे में उड़ते हुए सपने देखे।