दादी का पत्र

"दादी का पत्र" is a Paper Cut picture book starring a छोटी लड़की by Guest for Ages 6–9 — created with Doodara, the AI storybook maker for kids

by Guest · Paper Cut · Ages 6–9 · छोटी लड़की · 10 pages

curious, cheerful

दादी और पोती की मोहब्बत

फ़ोन उल्टा, सिर-होठ पर रखा। ओव़ी ने छोटी मेज़ पर पुरानी किताबों का पूरा ढेर एक धक्के में साइड हटा दिया, जैसे कोई पुरानी जगह खाली कर रही हो। नीचे से कागज़ की सूखी चपकाहट आई, पेन्सिलों का टिक-टाक। ख़ुशक लाल मोम की गंध बनी रही, हवा में टाँग-टाँग कर।

किताबों के नीचे — एक पतला लिफ़ाफ़ा, लाल मोम से सीला हुआ, सील टूटने-लाय। ओव़ी ने उँगलियों से उठाया, मोम की टूटियाँ टिक-टिक कर मेज़ पर गिरने लगीं। लिफ़ाफ़ा इतना हल्का था कि उठाने पर हवा भी नहीं चली, बस उँगलियों के नीचे एक सूखी फटकार।

"तुमने मुझे चिठ्ठी लिखी?" वो शब्ब झिंपी जैसा गहरा गया, जैसे तालाब में पत्थर डाला हो और लहर धीरे-धीरे गायब हो जाए। दादी की थिरकी हुई उँगलियों की लिखाई, उलटी-पलटी अक्षर। लाल मोम की टूटियाँ मेज़ पर बिखरी चुपचाप पड़ी रहीं। एक भी हिली नहीं।

ओव़ी ने लिफ़ाफ़े का गला खोला। अंदर एक ही पत्ता — हल्दी और गरम चाय की गंध उठी, कोने में दो छड़ी-जैसी रेखाओं के चिह्न, हाथ-से-हाथ जोड़े हुए, किसी बच्चे की पेंसिल से खींचे हो। पत्ता सूखा था, किनारे पीले पड़े, जैसे हज़ार बार पढ़ा गया हो।

"मेरी छोटी ओव़ी, मैं तुम्हारी आवाज़ अपने जेब में रखती हूँ।" ओव़ी ने पढ़ा। आवाज़ फ़ोन की तरह टूटी नहीं, कहीं से नहीं आई — बस एक पतली धार, कागज़ के ऊपर बैठ गई, चुपचाप, सही जगह, जैसे कोई पत्ती ज़मीन पर गिरी हो। उँगलियों ने पत्ते को हल्का सा सिकोड़ा।

फिर से पढ़ी। फिर से। फिर से। हर बार कागज़ थोड़ा नाक की तरफ़ आता गया, तीसरी बार पत्ता नाक के ठीक नीचे था — जहाँ गरम चाय की गंध सबसे ठोस होती है। उँगलियों का दबाव हर बार हल्का होता गया, जैसे कागज़ को एक और साँस लेने दें।

"तुमने मेरी आवाज़ अपने कागज़ में रखी है?" ओव़ी ने अपनी उँगली कागज़ के ऊपर रखी, अंतिम पंक्ति पर, धीरे-धीरे खींची। लैंप की रोशनी में धूल के कण तैर रहे थे, लैंप टिक-टिक कर रहा था। दूर एक कुत्ता भौंका — एक बार — फिर चुप। सन्नाटा एक रोकी हुई साँस जैसा था।

ओव़ी ने पेन्सिल का कप उतारा, फंके हुए कागज़ पर लिखना शुरू किया: "दादी, मैं तुम्हारी आवाज़ अपने कागज़ में रख रही हूँ।" बीच में — चक्र! पेन्सिल टूट गई, टूटी ज़गह का लकड़ी का छोटा टुकड़ा दिखा। ओव़ी ने टूटा सिर्फ़ उठा, देखती रही, उँगलियों के बीच।

छोटा सा टुकड़ा उठा, जोड़ा: "ज़िम्मी। जैसे ये चिठ्ठी।" टूटी पेन्सिल का टुकड़ा मेज़ पर टिक करता पड़ा, लकड़ी की गंध उठी। कागज़ को चौकोर मोड़ा, फिर छोटा चौकोर, फिर और छोटा — बटन जितना, बड़ा लिफ़ाफ़े और टूटी पेन्सिल के बीच आँका।

बटन-सा कागज़ बड़ी चिठ्ठी के नीचे रखा, दोनों को एक-समान दबाया, फ़्लैट। "शुभ रात्रि" — मेज़ की तरफ़ फुसफुसाया, बस कागज़ के लिए। लैंप की छाया लंबी दीवार तक गई, दोनों चिठ्ठियाँ दो छोटे तकिये जैसी, एक-दूसरे के बगल में। पेन्सिल का टूटा सिर्फ़ मेज़ के किनारे तक उतरा, रुक गया। घर चुप था।

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दादी का पत्र

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