रात के समय, आर्यन एक पुरानी हवेली के सामने खड़ा था। कमरा नंबर 50 की खिड़की अंधेरी थी, लेकिन दरवाजे से टिक-टिक की आवाज़ आ रही थी।
आर्यन ने दरवाजे का हैंडल पकड़ा। अंदर से टिक-टिक आवाज़ आ रही थी — जैसे कोई छोटा घड़ी बीत रहा हो। उसने लंच को हल्का सा हिलाया — क्लिक!
आर्यन अंदर घुसा। कमरे में धूल थी और पुरानी खुशबू। उसने एक पैर अचानक उठाया — लकड़ी का फर्श चरमराया।
लकड़ी का तख़्ता ऊपर उठ गया। नीचे एक पुरानी तस्वीर और एक छोटी किताब थी। आर्यन ने किताब खोली — लिखावट उसकी अपनी थी!
आर्यन कोणी में गया और ज़मीन खोदने लगा। पहले मिट्टी में, फिर जड़ों के नीचे — तीसरी बार, उंगलियों ने लकड़ी छुई।
उसने एक टिन का बक्सा खींचा! उसके ऊपर एक तारा बना हुआ था। आर्यन के हाथ कस गए — यह तो उसकी अपनी खज़ाना था!
ढक्कन खुला — सोने के सिक्के और एक मेडल गिर पड़े! मेडल पर लिखा था — 'बहादुर खोजी'। आर्यन जोर से हंसा।
आर्यन ने बक्सा ऊपर उठाया। तभी दरवाजे के बाहर कदमों की आवाज़ आई — माँ-पापा की आवाज़!
माँ ने दौड़कर आर्यन को गोद में उठा लिया। पापा बक्सा देखकर मुस्कुरा रहे थे। 'यह तो तेरा बचपन का खज़ाना है!' पापा ने कहा।
रात को, आर्यन अपने बिस्तर पर सोया। उसके तकिए के पास वह टिन बक्सा था। चाँदनी में तारा चमक रहा था।