पहाड़ी गाँव की छत पर मीरा ने गमले में गुलाबों को पीना दिया। फिर उसने हल्का सा खाली पानी की डिबली उठाई। भीतर कुछ नहीं था। सिर्फ़ सूखी मिट्टी की बदबू आ रही थी।
मीरा ने डिबली उलटी कर दी। नीचे से पानी की पतली धार fissure से बाहर निकलकर सूखी ईंटों पर बरसने लगी। उसने आँखें मूंद लीं। फिर हाथ से ज़मीन सहलाते हुए कहा, 'फिर से? इसी तरह?'
मीरा ने गीली ठंडी मिट्टी उठाई और दरार पर चिपका दी। दोनों हाथों से दबाया — पर अगले ही पल मिट्टी फिसल गई। पानी फिर टपकने लगा। उसने काँटे से एक पत्थर को ठोका। 'और क्या चाहिए?'
मीरा ने दादाजी का पुराना पित्तल का थाली उठाया। धूप का पीला बिंब दरार वाले हिस्से पर पड़ा। वह कोण बदलती गई — फिर देखा: मिट्टी सुखने लगी थी! अंधेर घने और ठोस होते जा रहे थे।
मीरा ने फिर ताज़ी गाढ़ी मिट्टी रखी और थाली को वैसा ही पकड़कर रखा। सोने जैसी किरण धीरे-धीरे मिट्टी को पकाती रही। माथे पर पसीने की बूंदें, पर नज़रें नहीं हटीं। अंत में दरार पूरी तरह बंद हो गई।
मीरा ने डिबली हल्का सा पलटी। कोई बूँद नहीं टपकी। फिर तांबे के लोटे से पानी भरा — ठंडा, शांत, भरपूर। अब उसे गुलाबों तक ले जाना था।
चीटी की तरह मीरा चलती हुई गुलाबों के पास पहुँची। पहाड़ी गाँव की छत पर लाल मिट्टी के फूल धूप में चमक रहे थे। मीरा ने मुस्कुराते हुए सोचा, 'बिल्कुल सही समय पर प्यास लगी होगी।'
पानी की ठंडी धार गुलाबों की जड़ों में गिरी। पत्ते हिले, फूल तेज़ नारंगी हो गए। मीरा ने एक गहरी साँस ली और पूछा, 'अब ठीक रहेगा न?'
गमले के बीच मीरा बैठ गई। हवा में मिट्टी और फूलों की खुशबू थी। दूर एक बच्चे की हँसी गूंजी। उसने आसमान की तरफ देखा — बादल धीरे-धीरे सरक रहे थे। सब कुछ ठीक था।
सूरज ढलता गया, छत पर सुनहरा रंग फैल गया। मीरा ने उठकर थाली साफ़ की और वह वापस दादाजी की जगह रख दी। कल फिर कोई काम会是 — पर आज सब ठीक था।