शेरू के विशाल पंजों ने सूखी और दरारों वाली जमीन पर कदम रखा। धूल का बादल उठा जिसमें पुरानी राख की गंध थी। चारों ओर सन्नाटा था, कोई पक्षी नहीं चहचहा रहा था। जमीन टूटी हुई और मृत महसूस होती थी। शेरू रुक गया, उसके कान हवा में हिले।
उसने देखा कि किसान मिट्टी के घड़े से आखिरी बूंद एक सूखे पौधे को दे रहा है। शेरू ने अपनी सूंड से किसान के कंधे को हल्का सा ठोका। उसकी छाती में एक गड़गड़ाहट भरी थी। क्या उसकी ताकत यहाँ काम आएगी? वह सोचने लगा।
शेरू ने अपना सिर ऊपर उठाया और जोरदार दहाड़ लगाई। सूखी झुलसी हुई बालियाँ हिल उठीं। कबूतरों का झुंड अचानक आसमान में उड़ गया। आवाज़ खेतों में गूंजी, लेकिन बारिश नहीं आई। सिर्फ मुरझाई घास की सरसराहट सुनाई दी।
अचानक बादल गहरे नहीं हुए, हजारों छोटे चींटियों के ढेर थे। वे सीधी रेखा में चल रही थीं। वे जमीन की सख्त परत को कुतरने लगीं। नमी को गहरा जाने के लिए रास्ता बनाने के लिए। मिट्टी तुरंत ढीली होने लगी।
नرم हो गई जमीन से हरे अंकुर निकले। धूल की बदले में मिठास महसूस हुई। शेरू पीछे हटकर बैठ गया। किसान मुस्कुरा रहा था। पहला सच्चा पत्ता खुल रहा था। उनके पीछे का जंगल फिर से हरा हो रहा था।
जंगल ने आराम से सांस ली। हरियाली वापस आ रही थी। शेरू ने अपनी पूंछ हिलाई। यह सब बहुत धीमा था, लेकिन यह काम किया था।
शेरू उठ खड़ा हुआ। उसकी छाती अब शांत थी। उसने किसान की ओर देखा। कोई बातचीत नहीं थी, बस समझदारी थी। दोनों ने एक साथ काम किया था।
शेरू ने आखिरी बार इधर-उधर देखा। जमीन अब जीवित लग रही थी। वह मुड़ा और जंगल की ओर बढ़ा। पीछे हरे अंकुर हवा में नाच रहे थे। कहानी यहीं समाप्त होती है।