त्योहार की शाम घर फूलों और दीपों से जगमगा रहा था। वीरांश ने सफेद प्रेम-पत्र चुपचाप चाँदी की पूजा-थाली के नीचे सरका दिया। तभी उसके ससुर ने थाली उठाकर पत्र देख लिया। वीरांश ने हाथ बढ़ाया और फुसफुसाया, “कृपया—इसे यहाँ मत पढ़िए।” पीतल की घंटी टन से बज उठी, और रिश्तेदार मुड़कर देखने लगे।
वीरांश अपने ससुर के पीछे आँगन तक गया। उसने काँपती उँगलियों से पीले फूलों की माला आगे की और कहा, “यह पत्र बस एक निजी भावना थी।” हवा चली, माला के फूल रंगोली पर बिखर गए। उसके ससुर ने आँखें झुकाईं और बोले, “हमारे स्नेह की एक सुरक्षित सीमा होनी चाहिए।”
रसोई के कोने में वीरांश ने दूसरा पत्र छोटे-छोटे टुकड़ों में फाड़ दिया। फिर वह अपने ससुर के साथ दाल और सब्ज़ी तैयार करने लगा। प्रेशर कुकर ने रेलगाड़ी जैसी सीटी मारी; वीरांश उछल पड़ा और चम्मच दाल में गिर गया। पास बैठे परिवार ने एक-दूसरे को देखा। चुप्पी अब छिपी नहीं रही।
भोजन-कक्ष में सबके सामने वीरांश ने धीरे-धीरे सच कह दिया। उसने कहा, “मेरे मन में प्रेम था, पर मैं आपकी सीमा स्वीकार करता हूँ।” कोई थाली नहीं खनकी। उसके ससुर ने अनछुआ प्रेम-पत्र त्योहार के दीपक के पास रख दिया और बोले, “दूरी बदलने पर भी सम्मान रह सकता है।”
तभी खुली खिड़की से एक शरारती पतंग भीतर आ गिरी। उसने कागज़ के प्याले उड़ा दिए और कमरे में खड़खड़ाहट भर दी। सबकी आँखें पतंग पर टिक गईं। फिर किसी के होंठों से हँसी फूटी, और भारी चुप्पी थोड़ी ढीली पड़ गई।
अगली शाम वीरांश परिवार की बैठक में अलग जगह बैठा। उसने कोई गुप्त पत्र नहीं लिखा; इसके बदले दोनों हाथ जोड़कर दूर से अभिवादन किया। उसके ससुर ने हल्का-सा सिर झुकाकर उत्तर दिया। बीच में रखी खाली चौकी ने नई दूरी को साफ़ दिखाया।
मिठाइयाँ बाँटी गईं और संध्या-प्रार्थना शुरू हुई। शंख बजा तो वीरांश ने हाथ जोड़ लिए। उसके ससुर ने कमरे के पार से एक लड्डू उसकी ओर बढ़ाया। वीरांश ने मुस्कराकर उसे लिया। इस बार उनके बीच कोई छिपा कागज़ नहीं था, केवल साफ़ जगह और साझा हँसी थी।
प्रार्थना की धुन धीमी हुई, पर हँसी बनी रही। वीरांश ने लड्डू का छोटा टुकड़ा उठाया और सामने बैठे अपने ससुर को दिखाया। दोनों ने सिर हिलाकर मिठास बाँटी। दीपक की लौ स्थिर रही, जबकि आँगन में त्योहार की रोशनियाँ देर तक चमकती रहीं।